दीपोत्सव की तैयारियां चल रही है।इस त्यौहार पर मिठाई,कपडे और मिट्टी के दीये बनाने वालों का खासा समय रहता है।लेकिन आज आमजन पर आधुनिकता का असर साफ नजर आ रहा है।बाजार सजने लगे है।जिसमे सुन्दर दीपक भी बिकते नजर आ रहे है।लेकिन ये दीपक और सजावट के सामान मिट्टी की बजाय प्लास्ट आफ पेरिस और चीनी मिट्टी के बने है।ये दिखने मे तो सुन्दर है लेकिन परंपरा से कोसों दूर है।इनके प्रयोग से गरीब प्रजापत को आर्थिक नुकसान होने के साथ वातारवण भी दूषित होता है। बाजारों मे ग्राहकों की भीड जरुर है।लेकिन इन ग्राहकों से होने वाला फायदा हाथ कलाकारों को होने के बजाय बडी फैक्ट्री के मालिकों को हो रहा है।बाजारों मे चाक से बर्तन बनाने वाले भी निराश है।उनकी बिक्री हो रही है।लेकिन फायदा केवल दस फीसदी ही होता है।इन बर्तनों और दीपों से होने वाला मुनाफा इनके लिये नही है।इनकी बिक्री के बाद बचा माल भी कारीगर को नुकसान ही पंहुचाता है।लेकिन समय की मांग और ग्राहकों की जरुरत को देखते हुए भी इन कलाकारों ने अपनी कला को दरकिनारकर रेडीमेड दीपक और सजावट के सामान रखने शुरु कर दिये है।कारीगरों का मानना है कि दो वर्ष लोक डाउन से पूर्व तक ग्राहकों की मांग मिट्टी के बर्तन और दीपक थी।लेकिन इस वर्ष अब लोग चीनी मिट्टी और पीओपी के दीपक की मांग करने लगे है।इससे फायदा कम होने के साथ ही मिट्टी से बर्तन बनाने वाले कारीगरों की रोजी-रोटी कमजोर हो गयी है।

